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"नमक स्वादानुसार"..बस टाइटल चोरी का है.

आप सोच रहे होंगे ये जनाब अपनी कहानी का टाइटल निखिल सचान की "नमक स्वादानुसार" से चुरा कर लाये है,तो बिलकुल सही सोच रहे है,क्या है ना मैं परवाह नहीं करता क्या कहाँ से आया,और मैं कहाँ से लाया और वैसे भी किसी महान पुरुष ने कहा है अगर कोई चीज कुछ सिखाती है तो उसे अपने जीवन में उतार लो..पर मैंने तो चुरा लिया क्यों मुझे नमक स्वादानुसार ही लगता है और शायद आपको भी,दरअसल मैं कोई महान लेखक तो हूँ नहीं लेकिन जब भी दिमाग के कीड़े मुझे बैचैन करते है मैं अपने आप को लिखने के लिए कहता हूँ..

सुबह का समय था..
रोज की तरह ७.४० पर उठा लेकिन मेरे आलस की अंगड़ाई मेरे वयस्त समय पर चद्दर डाल कर सोने को मजबूर कर रही थी..१० मिनिट और सो लिया जाय आप मैं हम सब ऐसे ही मन को चुतिया बना कर सोने की कोशिश करते है लेकिन ये १० मिनिट कब ३० मिनिट में बदल जाते है पता ही नहीं चलता..निचे रूम से उठ कर यही सोचता आ आ रहा था "अनु आज मुझे उठाने क्यों नहीं आया?शायद आया भी हो लेकिन मैं उठा नहीं हो?अगर में उठा नहीं तो वो देखते ही चिल्लायेगा? ये सवाल खुद से पूछ कर खुद से जवाब मांग रहा था..लेकिन ऊपर रूम में जा कर देखा तो बाबा आज योगासन नहीं शवासन कर रहे थे..
उठा नहीं आज ये ? मैंने ६ बजे ही उठ कर रात का खाया कमोड में डाल देने वाले सचिन से पूछा..बता दूँ सचिन अपने करियर के प्रति इतना वफादार है जितना में ज्योति के प्रति चाहते हुए भी ना बन सका..
नहीं अभी तक तो नहीं.."सीधा जवाब दे कर सचिन फिर अपनी गेट की तैयारी में लग गया"
जब जवाब सुनकर आगे बड़ा तो बाबा को देख कर हंसी छूट गयी बाबा रात में सोते टाइम घडी की सुई की तरह घंटा बदलते है सॉरी घंटे की तरह दिशा बदलते है एक हाथ से घंटा ऐसे पकड़ते है जैसे हम चारो रूम पार्टनर्स में से कोई उनका घंटा निकाल कर अपने घंटे से बदल लेगा..ये सब सोचते हुए मैं किचन में पहुंचा...
"घंटा यार आज भी ये आंटी अब तक नहीं आयी साला सुबह उठो खुद,धोऊ खुद,बनाओ खुद और खाओ खुद" मैंने गुस्से से पूछा असल मैं पूछा मैंने कम और कहा ज्यादा था क्यों की मैं सचिन से सीधे सवाल पूछने के मूड में नहीं था और ना ही वो मेरे हर सवाल के जवाब देने के...
मुझे बता नहीं शायद लेट आये.."सचिन ने गेट की किताब से झांक कर कहा"
मुझे फिर घंटे की स्थिति देख कर अपने घंटे का ख्याल आया जिसे देख कर में समझ गया मैं ऑफिस और रोज की दिहाड़ी के लिए लेट हो रहा हूँ..
 "देखो सूरज निकल आया है..फिर मजदूर काम पर आया है..
कोई गमछा लपेटे तो कोई टाई बंधे आया है"
अक्क्सर घर पर उठने के बाद चाय मिल ही जाती है लेकिन बैचलर्स वाली जिंदगी में सुबह की शुरुआत सीधे रोटी से ही होती है लेकिन मुझे लग चुका था आज अपना हाथ ही जग्गनाथ है..
जल्दी से नहा कर,अपने घंटे को सही दिशा में कर चुके बाबा से पूछा "चावल कौन-कौन लेगा" कमरे में तीन ही लौंडे थे मेरे सहित पर मैंने शायद किसी चौथे के आ जाने की उम्मीद भी की थी दीप्ती वाला दीपक पिछले कही दिनों से घर गया था और उसने ३० जून को आने का कहा था लेकिन जी.एस.टी. का घंटा आधी रात को बजने के बाद शायद उसका घंटा अभी बजा ना हो..वो आज सुबह तक भी नहीं लौटा था..
इसमें पूछने वाली क्या बात है बना लो सबके लिए "बाबा जाग चुका था मुँह में दन्तक्रांति डालते हुए उसने मुझसे कहा"
मैंने बस हां में सर हिला कर उसके भूखे पेट को दिलासा कम जवाब ज्यादा दिया..
हम सब हर सुबह अपनी मंज़िल को बदलने के लिए भागते है,जॉब से संतुष्ट ना हो तो उसे बदलने के लिए भागते है,ज्योति को राहुल से छीन लेने के लिए भागते है,अपने आगे पीछे हुए हादसों को बदलने के लिए भागते है..बस भागते रहते है अपना घंटा लिए घडी के घंटे की तरह..मैं भी भाग ही रहा हूँ पर कुछ और पाने की कोशिश में,क्योकि अब ज्योति नहीं मिलनी राहुल लौटाएगा नहीं,घर मुझे परेशान करता है,रिश्तो से मुझे नफरत है जब कोई बेजा ही आपका फायदा उठा ले तो आप टूट जाते है कभी मुक़्क़मल नहीं हो पाते है घर पर सब कैसे होंगे?ज्योति अपने बच्चो का नाम क्या रखेगी?क्या वो मेरा दिया हुआ ना उसके बच्चे को देगी?मेरी किस्मत कब बदलेगी? बहुत कुछ सवाल खुद से पूछ रहा था हर एक सवाल की एक कसम अपने आप को बदलने की कसम अपनी जिंदगी को आसमान में उड़ाने की कसम...रेलवे ठेसन,सरवटे आखिरी स्टॉप है कोई? ये आवाज मेरी सोच भरी सोच को तोड़ते हुए मेरे कानो के सरपटो पर थप्पड़ की तरह गुंजी..ये बस वाले,मैजिक वाले,टेम्पो वाले,ऑटो वाले हर जगह के नाम की माँ बैन क्यों कर देते है ठेसन नहीं स्टेशन होता है भाई "इतना कह कर मैं भी अपनी मंजिल के दूसरे पायदान की और बड़ गया"
आज सुबह से कुछ अलग दिन था बाबा टाइम पर उठा नहीं था,आंटी टाइम पर नहीं आई थी लेकिन बस टाइम पर थी..मैंने जैसे बस में अपना रोज की तरह दिखने वाला चेहरा डाला साथ में मेरा रोज की तरह दिखने वाला शरीर भी चला आया..हर समय एक ऐसी जगह चाहता हूँ जंहा मैं बस अकेला रहूं कम से कम ज्योति के जाने के बाद में बदल चुका था लेकिन आज मेरी सीट पर कोई और बैठी थी..मैंने नज़र अंदाज किया लेकिन उसके चेहरे को देख कर उसके पास बैठ कर सफर करना ही ठीक समझा..इंसान है ही घंटे की तरह दिन में ना जाने कितनी बार बदलता है..मैंने अब थोड़ी देर के लिए अपने दिमाग के वल्गेरिया को बाहर निकाल कर उससे बात करने की कोशिश की...
आप रोज इसी समय जाती हो? मैंने अपने बत्तीस..नहीं तेत्तिस दाँत निकालते हुए पूछा..मुझे लगा मेरे मुँह से भी क्लॉस-उप वाली खुशबु आये पर में भूल गया था मैं काणिये बाबा का दंतक्रांति करके आया हूँ..
हां.."जवाब में उसने अपने स्कार्फ़ के अंदर से ही कहा"
कंहा तक जाना है आपको? थोड़ी चुप्पी के बाद मैंने पूछा
अरबिंदो..इस बार थोड़ा जवाब ज्यादा बड़ा था या मुझे बहुत बड़ा लगा मैंने उसके स्कार्फ़ के अंदर हलचल करते होंटो को पड़ना शुरू ही किया था की उसने अपना स्कार्फ़ खोल दिया शायद वो अब मुझसे असहज महसूस नहीं कर रही थी या फिर मैंने अपने मन को समझाने के लिए ऐसा मान लिया..
क्या आंखे थी..ना हिरणी जैसी ना मोरनी जैसी बस आंखे आँखों जैसी थी बड़ी बड़ी आँखे उस ज्यामिति आकार के चेहरे पर और भी प्यारी लग रही थी,होंटो का आकार ऐसे था मानो जैसे गुलाब की पंखुडिया अभी सो कर उठी हो..गालो पर नजाकत,ना जाने कब देखते देखते हम दोनों आधे सफर में पहुँच चुके थे..मैंने अपनी घबराहट को छुपा लेने के लिए अपने बेग से निखिल सचान को निकलना ही ठीक समझा..कल इसी बेग में सत्य व्यास थे और परसो दिव्यप्रकाश दुबे..हां तो नमक स्वादानुसार मेरे हाथो में थी और मेरे जैसे किस्मत के मारे चैप्टर पड़ने की कोशिश करते है "सुहागरात" वेदिका,सत्यप्रकाश,राहुल,ड्राइवर,और मामा के लड़के की सुहागरात वाली कहानी..खैर मुझे ख़ुशी तब हुयी जब दिव्य ने मेरे मैसेज का जवाब दिया इससे पहले सत्य व्यास ने जवाब दिया था आज कल मैं अपने आप को चरम पर महसूस कर रहा था..
तुम हमेशा पढ़ते हो या आज कुछ खास है? मेरी उलझनों और उसकी चुप्पी को तोड़ती हुयी एक आवाज़ सन्न सी मेरे कानो तक आयी...
तुम कब आयी? "ये मेरे सवाल का जवाब नहीं हुआ और सही भी था ये सीरी के सवाल का जवाब भी नहीं था"
नहीं बस कभी-कभी पढ़ लेता हूँ..मैंने ऐसा कहा जैसे कोई बच्चा अपनी चोरी छुपा रहा हो..
मैंने उठकर सीरी को अपनी जगह बैठा कर वंहा से रुख्सत की...
मैं अपनी जॉब पर था और उसी ख्याल में कही सीरी नाराज तो नहीं हुयी होगी ना..दरअसल सीरी मेरे साथ रोज १५ मिनिट का सफर तय करती है और हम अच्छे से थोड़े अच्छे वाले दोस्त है लेकिन दुनिया को घंटा फर्क पड़ता है दोस्ती से आपको एक साथ देख कर वो तो वंही सोचेंगे जो दिमाग का वल्गेरिया होगा....
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..१२.३८ मिनिट लंच ब्रेक से पहले ही डिब्बा खोल कर चावल खा रहा था..नमक बिलकुल स्वादानुसार था
..मैसेज की आवाज़ ने मेरी बैचैनी तो तोड़ते हुए एक आवाज़ की...
..
..तुम सच में बहुत बड़े duffer हो..तुम्हे ये भी नहीं पता लड़की के सामने क्या पढ़ते है
मेरी समझ से सब बाहर था मैंने सीरी को कॉल करना ही ठीक समझा..
..
हेलो..मैंने कहा
बोलो डफर..उसने कहा
तुमने ऐसा क्यों कहा की मुझे समझ नहीं लड़की के सामने क्या पढ़ना चाहिए? मैंने पूछा
जिसके पास तुम बैठे थे वो मेरी फ्रैंड पायल थी और मुझे पायल ने ही कहा की तुम उसके पास बैठ कर इतना घबरा गए की तुमने सीधे "सुहागरात" पढ़ना शुरू कर दिया..उसने कहा
अच्छा लेकिन मैंने जान बूझकर "सुहागरात" पढ़ रहा था..मैंने कहा
दिख रहा था वो तो..उसने कहा
अच्छा सुनो मुझे तुमसे कुछ कहना है..मैंने कहा
कहना तो मुझे भी है..उसने मेरी स्तिथि को भांपते हुए कहा..
क्या हम दोस्ती से आगे बड़ चुके है? मैंने अपनी बात मोड़ते हुए उससे  पूछा
हां मुझे भी यही लगता है लेकिन अभी क्लासेस है मैं तुमसे बात में बात करती हूँ..by love you और प्लीज् अब कॉल मत करना में फ्री हो कर तुमसे बात करती हूँ..इतना सब कुछ वो एक सांस में कह चुकी थी..
मैंने बस लव यू तक सूना बाद का मुझे जिंदगी के सन्नाटे से दिखती एक उम्मीद की किरण और उसके पुकारने की आवाज़ में सुनाई नहीं दिया..मैं उसको १०-१२ मर्तबा कॉल कर चुका था लेकिन उसके जवाब नहीं देने की वजह से परेशानी में उम्मीद खोज रहा था,पायल भी अब दिमाग से जा चुकी थी सूरज भी आधे आसमान पर चढ़कर घंटे की सुई को चिढ़ा रहा था,मैं भी अपने घंटे गिन रहा था,शाम होने में अभी पुरे साढ़े चार बाकी थे..बाबा भी उम्मीद है घंटा पकड़कर ना सोये..चावल में नमक भी स्वादानुसार था जिंदगी भी आज स्वादानुसार थी,जी एस टी भी स्वादानुसार थी,दिव्यप्रकाश का जवाब भी स्वादानुसार था,मसाला चाय भी स्वादानुसार थी,मुहा ये निखिल सचान इतना मसाला खाता क्यों है जो इसे लिखने की जरूरत पढ़े..कभी नमक,कभी चाय मसाला....खैर मैं जान चुका था मसाला जिंदगी में होता है बस "नमक स्वादानुसार" होना चाहिए...

लेखन- विजयराज पाटीदार (उम्मीद है पसंद आये)


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