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कल की बात और मिताली राज

कल की बात और मिताली राज
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रविवार का दिन,ऑफिसियल छुट्टी,फुर्सत या ये कह लीजिये एक बैचलर के लिए तमाम वो काम करने का दिन जो वो सप्ताह के ६ दिन नहीं कर सकता,सुबह वैसे नहीं हुयी जैसे रोज होती थी..आज थोड़ी देर तक सोया,लगभग साढ़े नौ बजे तक जब आँख खुली तो दीपक और सचिन अपनी कॉम्पिटिशन एक्साम की तैयारियो में वयस्त थे,मैंने ब्रश करने के बाद सीधे डेयरी पर जाकर दूध और पास वाले रेस्टॉरेंट से पांच पुड़िया पोहे पैक करवाये..रूम पर आकर हम सब ने संडे को स्पेशल बनाने के लिए कोई बेवजह का मुद्दा नहीं छेड़ा और ना किसी बात पर चर्चा की,आंटी ने खाना बनाया,.....हां क्या बनाये? इस पर थोड़ी चर्चा करने के बाद दाल बाटी बनाने का DECISION हुआ अब बारी थी निचे जा कर मकान मालकिन से ओवन लाने की अगर गांव में होता तो माँ गाय के गोबर से बने कंडो की धुनि बनाकर बाटी भार देती लेकिन शहरो ने गांवों के रिवाजो,परम्पराओ को लील लिया जैसे एक कुंवारी कन्या को एक चुटकी सिन्दूर सुहागन होने की सैज पर लील जाता है लेकिन दूसरी और आज का दिन ख़ास और बहुत ख़ास भी होने वाला था मिताली राज और उनकी टीम की पंद्रह-सोलह लड़कियों को कोई नहीं लीलने वाला था क्योंकि इन्होने अपने दम का कश जमके लगाया था इतने जमके की कुछ हिजड़े प्रजाति के लोगो के मुँह में गु डूस गया हो..धीरे धीरे दोपहर हुयी लॉर्ड्स के मैदान पर भीड़ जुटी जो लॉर्ड्स में नहीं था वो अपने घरो की टीवीयो पर बीवियों की बाहें थाम कर जुटा था...एक एक ओवर के बाद मैच आगे बढ़ रहा था जिओ का डाटा भी उड़ रहा था पर किसे परवाह थी क्योंकि आज तो इतिहास बदलने वाला था धीरे मैच दर-ब-दर बदलता रहा,शाम होते होते हमने भी चावल गैस पर चढ़ा दिए थे दीपक-सचिन और हम सब को उम्मीद थी हम जीतेंगे और इसी उम्मीद में दीपक ने कहा भी  ६३ गेंद पर ६६ रन चाहिए..मैंने कहा हम मैच हारने वाले है धीरे धीरे मैच हम हार रहे थे लेकिन मैंने हारने की बात इसलिए नहीं बोली थी की में इंडिया को हारते हुए देखना चाहता हूँ लेकिन मुझे डर था हम हार रहे है और भरोसा था लड़कियाँ मेरी बात गलत साबित कर देंगी,कुछ दिन पहले में एक लड़की से मिला था नाम लेना ठीक तो नहीं रहेगा इसलिए उसे अज्ञात मान लेते है हमारे बात एक डेटिंग साइट पर हुयी थी वो भी अपने काम में परफेक्ट थी वो sure थी तभी उसने मुझसे डील करते टाइम अपने रेट में कोई चेंज या फ्री या एक्स्ट्रा जैसा कुछ नहीं दिया सौदा हुआ नहीं क्योंकि मेरे पास पांच सौ पर sot के हिसाब का बजट था और उसका एक हज़ार पर sot से नीचे एक भी रुपया कम करने का मन नहीं था..मैंने उस बात को वहीं ख़त्म कर दिया लेकिन कल जब महिला टीम इंडिया हारी तो कुछ लोगो की प्रतिक्रिया बहुत निराशाजनक रही.."इन्हे चूल्हा-चौका सम्भालना चाहिए"..इन्हे क्रिकेट खेलने की जरूरत क्या है..इन्हे ये करना चाहिए इन्हे वो करना चाहिए..लेकिन अगर में कहूं तो ये सब बेकार का सोचना है क्योंकि तुम आदमी लोग मिलके एक औरत की जिंदगी झंड करते हो,कभी बिस्तर की जरूरत तो कभी रोटियां बेलने की मशीन समझते हो..कभी बच्चे पैदा करने का हार्डवेयर..एक बात हमे और हमारे समाज को समझ लेनी चाहिए..एक औरत सब कुछ है उसने समाज की मर्द रूपी गंदगी को अपने गुप्तांग तक आने की जगह दी फिर हमने बदले में उसे क्या दिया? ये सोचने का विषय है बाकी मिताली राज,झूलन,और वो सब लड़कियाँ मेरी नज़र में उतनी ही सफल है जितना की पुरुष..बाकी अगर हम उन्हें कोस कर अपने मन की भड़ास निकाल रहे है तो शायद हम अपने घर में बड़ी हो रही बेटी,बूढी हो रही माँ को नजरअंदाज ही कर रहे है बाकी जिसकी जैसी सोच लेकिन मेरी तरफ से बधाई हर उस लड़की को जिसने चूल्हे-चौके से लेकर देश के सम्मान तक को संभाला है...जय हिन्द



कलम से- विजयराज पाटीदार 

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