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हम इतना शोर किस लिए कर रहे है जबकि हम सर्वधर्म की संस्कृति और उनके सम्म्मान के परिचायक है..हां हम सब एक है..

स हमत हूँ आपकी बात से और निष्पक्ष होकर बात करना पसंद करता हूँ...मोदी जी,योगी जी यहाँ तक हम सब हिंदुस्तानी है अगर हम चाहे की हिन्दू और मुसलमानो में फर्क हो तो ठीक है बाँट दीजिये आज अभी हम सब यही करते है आप मस्जिद के स्पीकर उतार दीजिये वो मंदिर के..हम उनकी पार्थनाओ को बंद कर देते है वह हमारी..गलत ही होगा ना अगर में किसी से कहूं भाईजान तुम्हारी मस्जिद की स्पीकर बहुत आवाज़ करती है यार पता है वो क्या बोलेगा "भाई मुश्किल से दिन में २० मिनिट की अज़ान करते है साल में दो चार बार मोहर्रम पर तासे ठोकते है"लेकिन सबसे ज्यादा स्पीकर तुम भी बजाते हो तुम्हारे धर्म में घंटो तक स्पीकर का सहारा ले कर आवाज़ लोगो तक पहुंचाई जाती है" चलो ये ज्ञान भी नहीं लगाए का तो सिर्फ इतना पूछेगा हमसे क्या हमारा देश नहीं है..और अगर आप चाहते हो हम दूसरे देशो की तरह इन पर पाबंदी लगाना शुरू कर दे तो करवा दीजिये उसके नतीजे पडोसी देश से आएंगे,आज इतने अमन चैन से रहने के बाद भी इस कौम के लोग उतपात मचाये हुए तो फिर कितना मचाएंगे सोचो और हां हम दूसरे देशो से तुलना करके बदल भी जाए तो क्या होगा पिछली बार इन्होने लाशो...

indian super market.. सुधार अभी बहुत बाकी है.

In today's market, the big supermarket has provided a lot of convenience for the consumer on one platform but it is similar to opening a grocery store in a deserted area. The only difference is that there is a crowd but there is no buyer, Percent people spend their time, other 40 percent do not buy more than 1000 rupees. The remaining 30 percent of people come to buy some essential goods in the real sense. For some time in such an environment, there was an opportunity to see these things, big discounts on expensive brands, and also sale of cottage goods. In the same sense, I do think that there is going to be a small problem in the market, It will take time for our Indian super market to come to Wal-Mart now. Because we have not only been following western culture but also use have done it as fast as possible. There are some things that even after being Indian, they prefer to sell foreign labels. The government has not stopped using Polythene yet. In the shame of taking bag in ...

हम बंधे हुए से है जाने कब आज़ाद होंगे..

आज की दौड़-भाग भरी जिंदगी में हम सब खुल कर जीना ही भूल गए है और ना जाने कितने तनाव को साथ ले कर घूम रहे है कुछ हम अपने लिए भी जिये थोड़ा ही सही पर खुल कर जिये... हम बंधे हुए से है जाने कब आज़ाद होंगे.. चल एक बार ही सही जिंदगी आज़ाद होते है.. स्कूल की ड्रेस से,कॉलेज की बैंच से, रिश्तो के धागों से,मोह के मायाजाल से, प्यार और अहसास के झूठे वादों से.. भागती-दौड़ती जिंदगी में,खाने-कमाने की होड़ से.. एक लम्हा चल हम आज़ाद होते है.. जिन्हें हम नहीं जानते उनके साथ भी हँसते है.. हम बंधे हुए से है जाने कब आज़ाद होंगे.. चल एक बार ही सही जिंदगी आज़ाद होते है.. समाज की बेड़ियो से,लोक-लाज-शरम की निगाहों से.. हम बंधे हुए से है जाने कब आज़ाद होंगे.. चल एक बार ही सही जिंदगी आज़ाद होते है.. कभी बटन कुर्ते के खोल कर..पैरो को जूतों से आज़ाद हम करते है बालो को ऐसे ही झूमने देते है..मुह धोने का झंझंट भी खत्म करते है... दांतो को कहा साफ़ करना कुछ दिन ऐसे ही जी कर देखते है.. सारी डखोसले-बाज़ी से अपने आप को आज़ाद करते है.. हम बंधे हुए से है जाने कब आज़ाद होंगे.. चल एक बार ही सही जिंदगी आज़ाद होते है.. ...

आत्महत्या या ह्त्या..?

जीवन ऊपर वाले का दिया हुआ सबसे अनमोल तौहफा है फिर ना जाने क्यों इस अनमोल तौह्फे की कद्र नहीं कर पाते दरअसल में बात जीवन की नहीं बल्कि इस जीवन में हमसे जुड़े लोगो की भी है क्यों कोई कैसे अपने आपको ख़त्म कर लेता है क्या उसको उससे जुड़े किसी इंसान की जरूरत ने नहीं रोका होगा..ये तब सोचता था जब मैंने जिंदगी को इतने करीब से नहीं जाना था.. असल में बहुत कुछ होता है जो हमे रोकता है इस तरह करने से पर इन सब बातो से भी ऊपर वो है जो अब तक हम जिंदगी जीने के लिए सहते आये..मान,सम्मान,पैसा,भविष्य सब कुछ जब लगता है सुरझित नहीं है तब इंसान अपने आप को जहर की गोलियों में,फांसी के फंदे में,धार की गोद में ढूंढता है..इस वजह से इस कहानी को नाम दिया है..आत्महत्या या हत्या..? हत्या इसलिए भी क्यों की ये समाज द्वारा,परिवार द्वारा दी गयी मौत ही तो है जो जिंदगी हारने  पर मजबूर करती है... बात पिछले दिनों की है दो मासूम बच्चियां सारी रात बिलखती रही अपनी माँ की बंद आँखों को खोलने की कोशिश करती रही..ये समाज का दिया उपकार ही तो था, या फिर खुद का जिंदगी से हार जाना..वो चली गयी है अब ये समाज के सामने का पह...

उन्मुक्त समाज का थप्पड़ ...

                                                                  उन्मुक्त समाज का थप्पड़ ... आज बात थोड़ी सी अलग करूँगा क्यों की पिछले कुछ सालो से हमारा समाज एक बीमारी से ग्रसित है और वो है उन्मुक्त समाज का थप्पड़ " जी हां ये एक ऐसा सत्य है जो कानून से कही ऊपर अपने आप को मानता है...पिछले दिनों एक घटना मेरे सामने आयी थी किसी ने चलती बस में पॉकेट मार दी और भी किसी एक लड़के को पकड़ कर समाज के चंद ठेकेदारो ने बीना सोचे समझे अपने बंधे हाथ खोल दिए..सबक सिखाना सही था पर क्या आज बस एक मात्र यही तरीका रह जाता है...असल में गुनाह हमारा है अपने आप को ऐसा बना रखा की इस तरह समाज में बीमारी दौड़ रही है...एक लड़की या लड़का अपने जीवन के यौवन में होते है तब अक्कसर प्रेम करने की गलती इस धूर्त समाज में कर  बैठते है..फिर बात आगे बढ़ती है और सामाजिक लोगो की तर्ष्णा फुट फुट कर बाहर आती है, सरे राह मुँह कला कर दिया जाता है,गध...

गुजरी हुयी यादे: काली रात (मर्डर मिस्ट्री)

गुजरी हुयी यादे: काली रात (मर्डर मिस्ट्री) : काली रात यह घटना पूर्ण रूप से काल्पनिक है किरदार और उनके नाम मात्र एक सयोंग है लेखक और पाठकों के बीच एक अजीब सी डोर होती है जिसे भाव कहते ...

"मेनफोर्स"

                                                                                                                                "मेनफोर्स" क्या आज हम एक हो जाएंगे...? ये सवाल मेरे उससे थे जिसने मुझे जीना सिखाया था..असल मे कोई किसी को कुछ नही सिखाता बस ठोकरे खाने से इंसान सिखता हे और बे-वजह दुनिया को कहता फिरता है,उसने मुझे ये सिखाया वो सिखाया। हाँ आज हम एक हो जाएंगे...ये लफ्ज उसके मुझसे थे। मैंने भी उत्सुकतावश पुछ लिया "प्रोटेक्शन युस करें या रहने दे"..जवाब मे बस इतना कुछ था"तु जल्दी आ जा मैं खाना बना लेती हूँ साथ मे खायेंगे। अजीब होता है ना प्रेम का अन-सुलझा सा रिश्ता..जिसके आखिरी छोर का पता भी नही और हम बस जी रहे होते है एक अलग सी दुनियाँ मे। भैया...भैय...