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हम बंधे हुए से है जाने कब आज़ाद होंगे..

आज की दौड़-भाग भरी जिंदगी में हम सब खुल कर जीना ही भूल गए है और ना जाने कितने तनाव को साथ ले कर घूम रहे है कुछ हम अपने लिए भी जिये थोड़ा ही सही पर खुल कर जिये... हम बंधे हुए से है जाने कब आज़ाद होंगे.. चल एक बार ही सही जिंदगी आज़ाद होते है.. स्कूल की ड्रेस से,कॉलेज की बैंच से, रिश्तो के धागों से,मोह के मायाजाल से, प्यार और अहसास के झूठे वादों से.. भागती-दौड़ती जिंदगी में,खाने-कमाने की होड़ से.. एक लम्हा चल हम आज़ाद होते है.. जिन्हें हम नहीं जानते उनके साथ भी हँसते है.. हम बंधे हुए से है जाने कब आज़ाद होंगे.. चल एक बार ही सही जिंदगी आज़ाद होते है.. समाज की बेड़ियो से,लोक-लाज-शरम की निगाहों से.. हम बंधे हुए से है जाने कब आज़ाद होंगे.. चल एक बार ही सही जिंदगी आज़ाद होते है.. कभी बटन कुर्ते के खोल कर..पैरो को जूतों से आज़ाद हम करते है बालो को ऐसे ही झूमने देते है..मुह धोने का झंझंट भी खत्म करते है... दांतो को कहा साफ़ करना कुछ दिन ऐसे ही जी कर देखते है.. सारी डखोसले-बाज़ी से अपने आप को आज़ाद करते है.. हम बंधे हुए से है जाने कब आज़ाद होंगे.. चल एक बार ही सही जिंदगी आज़ाद होते है.. ...

आत्महत्या या ह्त्या..?

जीवन ऊपर वाले का दिया हुआ सबसे अनमोल तौहफा है फिर ना जाने क्यों इस अनमोल तौह्फे की कद्र नहीं कर पाते दरअसल में बात जीवन की नहीं बल्कि इस जीवन में हमसे जुड़े लोगो की भी है क्यों कोई कैसे अपने आपको ख़त्म कर लेता है क्या उसको उससे जुड़े किसी इंसान की जरूरत ने नहीं रोका होगा..ये तब सोचता था जब मैंने जिंदगी को इतने करीब से नहीं जाना था.. असल में बहुत कुछ होता है जो हमे रोकता है इस तरह करने से पर इन सब बातो से भी ऊपर वो है जो अब तक हम जिंदगी जीने के लिए सहते आये..मान,सम्मान,पैसा,भविष्य सब कुछ जब लगता है सुरझित नहीं है तब इंसान अपने आप को जहर की गोलियों में,फांसी के फंदे में,धार की गोद में ढूंढता है..इस वजह से इस कहानी को नाम दिया है..आत्महत्या या हत्या..? हत्या इसलिए भी क्यों की ये समाज द्वारा,परिवार द्वारा दी गयी मौत ही तो है जो जिंदगी हारने  पर मजबूर करती है... बात पिछले दिनों की है दो मासूम बच्चियां सारी रात बिलखती रही अपनी माँ की बंद आँखों को खोलने की कोशिश करती रही..ये समाज का दिया उपकार ही तो था, या फिर खुद का जिंदगी से हार जाना..वो चली गयी है अब ये समाज के सामने का पह...

उन्मुक्त समाज का थप्पड़ ...

                                                                  उन्मुक्त समाज का थप्पड़ ... आज बात थोड़ी सी अलग करूँगा क्यों की पिछले कुछ सालो से हमारा समाज एक बीमारी से ग्रसित है और वो है उन्मुक्त समाज का थप्पड़ " जी हां ये एक ऐसा सत्य है जो कानून से कही ऊपर अपने आप को मानता है...पिछले दिनों एक घटना मेरे सामने आयी थी किसी ने चलती बस में पॉकेट मार दी और भी किसी एक लड़के को पकड़ कर समाज के चंद ठेकेदारो ने बीना सोचे समझे अपने बंधे हाथ खोल दिए..सबक सिखाना सही था पर क्या आज बस एक मात्र यही तरीका रह जाता है...असल में गुनाह हमारा है अपने आप को ऐसा बना रखा की इस तरह समाज में बीमारी दौड़ रही है...एक लड़की या लड़का अपने जीवन के यौवन में होते है तब अक्कसर प्रेम करने की गलती इस धूर्त समाज में कर  बैठते है..फिर बात आगे बढ़ती है और सामाजिक लोगो की तर्ष्णा फुट फुट कर बाहर आती है, सरे राह मुँह कला कर दिया जाता है,गध...

गुजरी हुयी यादे: काली रात (मर्डर मिस्ट्री)

गुजरी हुयी यादे: काली रात (मर्डर मिस्ट्री) : काली रात यह घटना पूर्ण रूप से काल्पनिक है किरदार और उनके नाम मात्र एक सयोंग है लेखक और पाठकों के बीच एक अजीब सी डोर होती है जिसे भाव कहते ...

"मेनफोर्स"

                                                                                                                                "मेनफोर्स" क्या आज हम एक हो जाएंगे...? ये सवाल मेरे उससे थे जिसने मुझे जीना सिखाया था..असल मे कोई किसी को कुछ नही सिखाता बस ठोकरे खाने से इंसान सिखता हे और बे-वजह दुनिया को कहता फिरता है,उसने मुझे ये सिखाया वो सिखाया। हाँ आज हम एक हो जाएंगे...ये लफ्ज उसके मुझसे थे। मैंने भी उत्सुकतावश पुछ लिया "प्रोटेक्शन युस करें या रहने दे"..जवाब मे बस इतना कुछ था"तु जल्दी आ जा मैं खाना बना लेती हूँ साथ मे खायेंगे। अजीब होता है ना प्रेम का अन-सुलझा सा रिश्ता..जिसके आखिरी छोर का पता भी नही और हम बस जी रहे होते है एक अलग सी दुनियाँ मे। भैया...भैय...

समाज बदलाव चाहता है....

समाज  बदलाव मे खो रहा हैं अजीब हे ना,अगर मे इस मुद्दे पर बात करूँगा तो शायद मुझे Made in china वाली घृणा से देखा जाये पर सत्य और सही कहने मे उतना ही फर्क है जितना सेक्स और फेक्स मे,दोनों शब्दो से काम का औचित्य बदल जाता है। आज बात करूँगा सेक्स के  फेक्स बनने की...... पिछले कुछ समय से अगर देखा जाये तो कमरे की चार दिवारी की सिसकियाँ अब मोबाइल के इनबाक्स मे आ सकती है। आधुनिकता के तौर मे आज सेक्स को फेक्स की तरह अपने प्रेमी/प्रेमिका के इनबाक्स मे भेजा जा सकता हैं,जिसे मैं तो कम से कम चुतियापा कहूँगा इसमे इतना ही मजा है जितना किसी को सपने मे याद करके बिस्तर खराब करना.....लेकिन फिर भी इसने बहुत ही रोचक प्रेम का विकास किया है.. ↣बकायदा इसमें आप बिना पैसा खर्च किये प्रेमी/प्रेमिका को शादी वाली पौशाक से लेकर इनर वियर तक महसूस कर सकते है. ↣ कभी कभी तो हद ही हो जाती है जब सेक्स के दर्द को लिख कर बंया किया जाता है. ↣और जब विश्वास अंतिम चरण पर होता है तब ये पर्सनल पिक्चर के आदान प्रदान तक पहुँच जाता है .. मानता हूँ समाज की मांग है बदलाव लेकिन युथ किस तरफ जा रही है ये वो इनके इ...

काली रात (मर्डर मिस्ट्री)

काली रात यह घटना पूर्ण रूप से काल्पनिक है किरदार और उनके नाम मात्र एक सयोंग है लेखक और पाठकों के बीच एक अजीब सी डोर होती है जिसे भाव कहते है,बस उसी भाव मन से "काली रात"पडियेगा।                                                               काली रात (मर्डर मिस्ट्री) राजू अरे राजू.....राजू जी साब........ राजू पानी पिला यार...... . लाया साहब.......(राजू बूढ़े साब के लिये पानी लेने किचन की और चला)....... ..आआआआआआआआआहहहहहहहहहह    (एक चीख रात के सन्नाटे को चीरती हुई ) घर के हर कमरे मे घूल जाती है... ..............रा...र ..राजू क्या हुआ तु चुप क्यों है  .. (आवाज लगाते हुए बुढे पाण्डे जी किचन मे चले गये)... ..आआआआआआआआहहहहहहहहह्अअअअअ (शायद अब ये आवाज बूढ़े पांडे जी की थी) सर से टपकता खुन और रूकी हुयी सांसे बंया कर रही थी की उनके शरीर मे जान बाकी नही रही है.... सुबह चार बजे..... इंस्पेक्टर- घर पर कल रात कौ...